देहरादून। उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण और कचरा प्रबंधन को लेकर एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा 01 अप्रैल 2026 से देशभर में लागू किए जा रहे 'ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026' के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकार ने शहरी एवं ग्रामीण स्थानीय निकायों के स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने यह जानकारी दी।
प्रदेश में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था अब नए नियमों के तहत और सख्त व वैज्ञानिक होने जा रही है। सचिवालय स्थित मीडिया सेंटर में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रदेश की तैयारियों और अब तक की प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देशभर में एक अप्रैल 2026 से लागू नए नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों के स्तर पर व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। नए नियमों में केवल कचरा उठाने और डंप करने के बजाय उसके वैज्ञानिक प्रबंधन, स्रोत पर पृथक्करण, रिसाइक्लिंग और संसाधनों के पुन: उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। इसके साथ ही सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि कचरे को बेकार समझने के बजाय उससे उपयोगी संसाधन तैयार किए जा सकें। डॉ. धकाते ने बताया कि वर्ष 2016 के नियमों में कचरा पृथक्करण की तीन श्रेणियां थीं, जबकि नए नियमों में इसे बढ़ाकर चार श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें गीला कचरा, सूखा कचरा, सैनिटरी कचरा और विशेष देखभाल वाला कचरा शामिल हैं। इसका उद्देश्य कचरे को शुरुआत में ही अलग कर उसके अनुसार प्रसंस्करण और निस्तारण सुनिश्चित करना है। नए नियमों में बड़े कचरा उत्पादकों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। 2,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल, प्रतिदिन 40 हजार लीटर से अधिक पानी की खपत अथवा प्रतिदिन 100 किलोग्राम से अधिक ठोस कचरा पैदा करने वाले प्रतिष्ठानों में से कोई एक मानक पूरा करने वाला संस्थान बल्क वेस्ट जनरेटर की श्रेणी में आएगा। ऐसे संस्थानों के पंजीकरण के साथ उनके कचरे के प्रसंस्करण और रिसाइक्लिंग की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के क्रम में प्रदेश के प्रत्येक जिले में डिस्ट्रिक्ट स्पेशल सेल गठित किए गए हैं। ये सेल शहरी और ग्रामीण निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था, डंपिंग साइट और पुराने जमा कचरे यानी लीगेसी वेस्ट के निस्तारण की लगातार निगरानी करेंगे। सरकार ने प्रदेश में जमा लीगेसी वेस्ट के निस्तारण का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक रखा है। राज्य में वर्तमान में लगभग शत-प्रतिशत डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण का दावा किया गया है। चार श्रेणियों में कचरा अलग-अलग एकत्र करने के लिए करीब 500 कचरा वाहनों में चार कम्पार्टमेंट की व्यवस्था की जा रही है। इसके साथ डिजिटल व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम भी लागू किया गया है, जिससे वाहनों की आवाजाही और कचरा संग्रहण व्यवस्था की निगरानी की जा सकेगी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि उत्तराखंड में प्रतिदिन करीब 1,930 मीट्रिक टन ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है। इसमें से लगभग 1,800 मीट्रिक टन कचरे का प्रतिदिन प्रसंस्करण किया जा रहा है। प्लास्टिक कचरे के लिए अलग से प्रसंस्करण की व्यवस्था भी की गई है। कचरा संग्रहण व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए प्रदेश में 657 नए वाहन खरीदे जा रहे हैं। इनमें करीब 480 ई-वाहन शामिल होंगे। अधिकारियों के अनुसार इससे कचरा परिवहन व्यवस्था को आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिलेगी। प्रदेश में वर्तमान में 22 इंटीग्रेटेड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, करीब 50 मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी और 600 से अधिक वेस्ट कम्पोस्टर संचालित हैं। इन व्यवस्थाओं को नए नियमों के अनुरूप और प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि कचरा प्रबंधन केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके सफल क्रियान्वयन के लिए नगर निकायों, ग्राम पंचायतों, जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आमजन की सामूहिक भागीदारी जरूरी है। नए नियमों के साथ अब चुनौती कचरा उठाने से आगे बढ़कर उसे सही जगह अलग करना, प्रसंस्कृत करना और दोबारा उपयोग में लाना है। उत्तराखंड में दिसंबर तक लीगेसी वेस्ट के निस्तारण का लक्ष्य इस दिशा में बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।