May 20, 2026

घर की जानकारी साझा करने से इनकार के चलते उत्तराखंड जनगणना मिशन को चुनौतियां

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उत्तराखंड में आगामी जनगणना-2027 के मद्देनजर चल रहे मकान सूचीकरण कार्य (HLO) को लेकर धामी सरकार ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। अब यदि किसी ने भी जनगणना करने पहुंचे कर्मचारियों को जानकारी देने से इनकार किया, सरकारी कार्य में बाधा डाली या उनके साथ असहयोग किया, तो उन्हें सीधे जेल की हवा खानी पड़ सकती है। जनगणना कार्य निदेशालय उत्तराखंड ने राज्य के सभी चार्ज अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा है कि बाधा उत्पन्न करने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ 'जनगणना अधिनियम-1948' के तहत तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाए। शासन के इस कड़े आदेश के बाद पूरे प्रशासनिक महकमे और जनता में हलचल तेज हो गई है।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से राजधानी देहरादून समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों से बेहद चौंकाने वाली और शर्मनाक घटनाएं सामने आ रही थीं। फील्ड में मुस्तैद जनगणना कर्मचारियों को कई जगह भारी विरोध, तीखी बहस और अभद्र व्यवहार का सामना करना पड़ रहा था। हद तो तब हो गई जब कुछ संभ्रांत इलाकों में लोगों ने कर्मचारियों को देखकर न सिर्फ दरवाजे बंद कर लिए, बल्कि उनके ऊपर अपने पालतू कुत्ते तक छोड़ दिए। कई जगहों पर कर्मचारियों को स्ट्रीट डॉग्स (आवारा कुत्तों) के हमले का शिकार होना पड़ा और वे चोटिल हो गए। कई वीआईपी कॉलोनियों में प्रगणकों को घर के बाहर घंटों इंतजार कराया गया। इन लगातार होती घटनाओं के कारण जनगणना कर्मियों में भारी डर, आक्रोश और असुरक्षा का माहौल था, जिसे देखते हुए अब शासन ने यह बड़ा कदम उठाया है। जनगणना कार्य निदेशालय द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में साफ कहा गया है कि मकान सूचीकरण का यह अभियान एक बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिशन है, जिसे निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरा करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। निदेशालय के संज्ञान में आया है कि कई लोग जानबूझकर सही आंकड़े छिपा रहे हैं और कर्मचारियों को घरों में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। कुछ संवेदनशील और विवादित मामलों में तो लोगों ने अपने मकानों की दीवारों पर लिखे गए 'जनगणना नंबर' तक मिटा दिए हैं। अधिकारियों का मानना है कि यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय कार्य को प्रभावित करने और उसमें अनावश्यक देरी करने की साजिश है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शासन ने स्पष्ट रूप से याद दिलाया है कि जनगणना अधिनियम-1948 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक का यह वैधानिक दायित्व है कि वह पूछे जाने पर सही और सटीक जानकारी उपलब्ध कराए। नया आदेश कहता है कि अधिकारी सबसे पहले लोगों को उनके कानूनी दायित्वों के प्रति जागरूक करें। यदि समझाने के बाद भी कोई व्यक्ति जानबूझकर अड़ंगा लगाता है, तो उसके खिलाफ अधिनियम की धारा-11 के तहत तत्काल संबंधित थाने में मुकदमा दर्ज कराया जाए। स्थानीय पुलिस कप्तानों और थानों को भी ऐसे मामलों में बिना देरी किए त्वरित एक्शन लेने को कहा गया है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, जनगणना महज सिरों को गिनने या आंकड़ों को इकट्ठा करने की कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह हमारे भविष्य की विकास योजनाओं और नीतियों की मजबूत नींव है। जनसंख्या, आवास की स्थिति, उपलब्ध संसाधनों और सामाजिक ढांचे से जुड़े इन्हीं प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर सरकार आगामी वर्षों के लिए विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं, अस्पतालों, स्कूलों और बजट का निर्धारण करती है। ऐसे में यदि जनता गलत जानकारी देती है या असहयोग करती है, तो इसका सीधा नुकसान राज्य के विकास और नीति निर्माण पर पड़ेगा। यही वजह है कि अब प्रशासन किसी भी स्तर पर ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य में बाधा डालने वालों से पूरी सख्ती से निपटने को तैयार है।