Sep 27, 2026

फर्जी और दोहरे वोटरों पर निर्वाचन आयोग का बड़ा प्रहार: उत्तराखंड के 5 जिलों में शुरू हुआ 'डीएसई-पीएसई' अभियान

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देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूचियों को पूरी तरह पारदर्शी, त्रुटिरहित और शुद्ध बनाने के उद्देश्य से मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने एक बड़ा और व्यापक अभियान शुरू किया है। राज्य में चल रही विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत अब डीएसई (डेमोग्राफिक सिमिलर एंट्री) और पीएसई (फोटोग्राफिक सिमिलर एंट्री) मॉड्यूल के जरिए दोहरे मतदाताओं की छंटनी का काम युद्धस्तर पर प्रारंभ हो गया है।

उत्तराखंड में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के अंतिम चरण में मतदाता सूचियों की शुद्धता को लेकर निर्वाचन आयोग ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब राज्य के पांच जिलों में डेमोग्राफिक सिमिलर एंट्री और फोटोग्राफिक सिमिलर एंट्री के जरिए ऐसे मतदाताओं की पहचान और सत्यापन किया जा रहा है, जिनका नाम उत्तराखंड के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में भी दर्ज होने की आशंका है। आयोग का उद्देश्य सत्यापन के बाद एक ही मतदाता का नाम दो राज्यों की मतदाता सूचियों में बने रहने की स्थिति को दूर करना है। इस अभियान के दायरे में देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और पौड़ी गढ़वाल को शामिल किया गया है। इन जिलों में उत्तर प्रदेश से भौगोलिक और सामाजिक जुड़ाव रखने वाले बड़ी संख्या में परिवार रहते हैं। ऐसे में दोनों राज्यों की मतदाता सूचियों में समान या मिलते-जुलते नाम सामने आने की संभावना को देखते हुए निर्वाचन तंत्र ने बूथ स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की है। डीएसई-पीएसई अभियान को डिजिटल माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है। संबंधित बूथ लेवल अधिकारियों को बीएलओ ऐप पर सत्यापन के लिए मॉड्यूल उपलब्ध कराया गया है। इसके माध्यम से उनके बूथ पर ऐसे मतदाताओं की जानकारी सामने आएगी, जिनकी प्रविष्टियां उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की मतदाता सूचियों में समान अथवा मिलती-जुलती पाई गई हैं। निर्वाचन प्रक्रिया में पीएसई यानी फोटो समानता वाली प्रविष्टियों के मामलों में फील्ड वेरिफिकेशन की व्यवस्था पहले से निर्धारित है। निर्वाचन आयोग के मैनुअल के अनुसार संभावित पीएसई मामलों की जांच के लिए बीएलओ स्तर पर सत्यापन किया जाता है और आवश्यक होने पर संबंधित फॉर्म की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। सॉफ्टवेयर से किसी मतदाता का नाम दोनों सूचियों में मिलता हुआ पाए जाने के बाद मामला सीधे नाम काटने तक सीमित नहीं रहेगा। बीएलओ संबंधित मतदाता के घर जाकर वास्तविक स्थिति का सत्यापन करेगा। मतदाता से पूछा जाएगा कि वह अपना नाम किस राज्य की मतदाता सूची में रखना चाहता है। यदि मतदाता उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में अपना नाम रखना चाहता है, तो उत्तराखंड की सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। वहीं यदि मतदाता उत्तराखंड में अपना नाम बनाए रखना चाहता है, तो संबंधित निर्वाचन अधिकारी उत्तर प्रदेश के संबंधित निर्वाचन अधिकारी से संपर्क कर वहां की सूची में आवश्यक कार्रवाई के लिए जानकारी भेजेंगे। इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि केवल सॉफ्टवेयर में नाम मैच होने को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा। वास्तविक स्थिति की जांच और निर्धारित निर्वाचन प्रक्रिया के बाद ही मतदाता सूची में बदलाव की कार्रवाई आगे बढ़ेगी। निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों में भी संभावित समान प्रविष्टियों के मामलों में सत्यापन और निर्धारित फॉर्म की प्रक्रिया का प्रावधान है। डीएसई यानी डेमोग्राफिक सिमिलर एंट्री के तहत केवल नाम ही नहीं, बल्कि मतदाता के अन्य विवरणों को भी मिलाया जाएगा। इसमें नाम, पिता या संबंधित व्यक्ति का नाम, जेंडर, उम्र और अन्य उपलब्ध विवरण शामिल हैं। वहीं पीएसई के तहत फोटो समानता के आधार पर संभावित समान प्रविष्टियों को चिन्हित किया जाएगा। सहायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी मस्तू दास के मुताबिक भारत निर्वाचन आयोग से डीएसई विद पीएसई अभियान की अनुमति मिलने के बाद उत्तराखंड में इसकी प्रक्रिया शुरू की गई है। उन्होंने बताया कि इसके लिए आयोग की ओर से एक मॉड्यूल उपलब्ध कराया गया है और बॉर्डर से जुड़े पांच जिलों में अभियान चलाया जा रहा है। उनके अनुसार जिन मतदाताओं की मैचिंग सामने आएगी, उनके मामलों में आगे की कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की जाएगी।उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया पहले ही दावे-आपत्तियों और नोटिसों के निस्तारण के चरण से गुजर रही है। निर्वाचन आयोग ने उत्तराखंड में अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख 3 अक्टूबर 2026 तक बढ़ाई है। ऐसे में डीएसई-पीएसई अभियान मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की कवायद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इसका सीधा असर उन मतदाताओं पर पड़ सकता है, जिनका निवास या पारिवारिक संबंध उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों से रहा है। हालांकि, मतदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि सिर्फ नाम मैच होने से तत्काल नाम नहीं काटा जाएगा। संबंधित प्रविष्टि का सत्यापन, मतदाता की स्थिति और उसकी पसंद को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दर्ज किया जाएगा। ऐसे में यदि बीएलओ सत्यापन के लिए घर पहुंचते हैं तो मतदाताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराना और अपने नाम की स्थिति स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा। इस पूरी कवायद का उद्देश्य एक ओर दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना है, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना भी है कि वास्तविक और पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर न हो। यही संतुलन एसआईआर के अंतिम चरण की सबसे बड़ी चुनौती भी है।